01/02/2011

जूता तो खाना ही था...

दिन जूते जैसे हुए खुशनुमा, तस्मों जैसी शामें,
तल्ले जैसी सच्चाई है, कीलों जैसी आहें,
एक जूता है जंतर-मंतर, दूजा है उन्मादी,
मुख पर बाजे अनहद सुर में, दूर करे बेस्वादी,
बुश बाबू! मुंह सूजा-सूजा, यह शुभ दिन आना ही था,
जाओ लिबर्टी मैया के घर, जूता तो खाना ही था.

वाह, लिबर्टी दस नंबर का, महक फूल शरमाए,
तेल से भीगा, कृष्ण वर्ण का, आय-हाय आए-हाए,
यह जूता है प्रजातंत्र का, नया नवेला चमड़ा,
ठाने बैठा अमरीका से, नव प्रतिरोधी रगड़ा,
तेल लुटैया, जंग करैया अब तो नाथ नथाना ही था,
व्हाइट हाउस के गब्बर-गोरे, जूता तो खाना ही था.

जान बची तो लाखों पाए, लाखों ले पेंटागन धाए,
डब्ल्यू एम डी खोज रहे थे, जूते खा गए बिन डकराए,
एक जूता है मुई खाल का, बच्चों-बूढ़ों-मांओं का,
दूजा अरब जवानों की उन, गगन चीरती आहों का,
खाओ और गुण बूझो चच्चा, विदा का यह परवाना था,
याद रखें श्री ब्लेयर टोनी, जूता तो खाना ही था.

दस-दस नंबर डेग-डेग पर उछल रहा है जूता,
इराकी जनगण ने ठोंका अधिनायक पर जूता,
समराजी छतरी टूटी है, टूट जाएगा बूता,
आगे ये निरबंश मरेंगे होंगे पूत-कपूता,
नौ-ग्यारह के गुनहगार बुश, पनही नजराना ही था,
झुकने-लेटने से क्या होगा, जूता तो खाना ही था.

जूते भर की जगह हाथ ले निकल पड़ा अल जीदी
क्लस्टर बम से फटी चदरिया जूते के बल सी दी
मुंतदार की पतित पावनी पनही के बलिहारी
कोंडलिजा कुंडली मारकर सुबक रही बेचारी
बुश काका, आगे फरमाओ, और कहां जाने का जी था
कौर-कौर में जिंदा मक्खी, जूता तो खाना ही था.

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