गरीबी रेखा / छब्बिस रुपया
अपने ही भीतर मुड़ जाए जिसकी लंबी जीभ
वही रक्तपायी अपना है वहिये कुटिल गरीब
छब्बिस रुपया रोटी भात, नून तेल लकड़ी
इहाँ-उहाँ कुछ बीन-बटोरे, चूल्हे मुंह मकड़ी
संविधान-युत हत्यारों के बल पर अड़ी-जड़ी
कुक्कुरमुत्त सी गोल इमारत, संसद बिहँस पड़ी
दिल-दिमाग मुर्दा हो बैठे, बोल रही पगड़ी
सुनत सीख लागत है ऐसो, ज्यों करुई ककड़ी
सहस सात सौ साठ अरब रुपयों की ली पगड़ी
छब्बिस रुपया वाले की हत्या की फूल-झड़ी
दीवाली की महाछूट, रुपयों की लाट गड़ी
चार सिंह रखवाली में हैं खींच रहे अंतड़ी
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