12/07/2012


शहीद रेचेल कोरी की याद
जिन्होंने इजराईली टैंक के पहिये तले फलस्तीन के लिए जंग लड़ी.


रेत का एक महल है
बड़ा चमकदार और ठोस
प्रेतों के प्राण भी कांपते हैं थर थर थर
शव की तरह अटके दिखते हैं चिमगादड
दम साध गोल-गोल निश्चल नन्हीं आँखों
रुकी हुई
घूरा किये हर आने जाने वाली/वाले को
उनकी आँखों में है खालिस भविष्य
पटरा है वर्तमान पसरा सा नींद भरा

समय की गेंद उछल कर हमारे पार जा चुकी होगी
भारत की आधुनिक निर्मल व्याख्या हो चुकी होगी
बारीक धार चाकू से उधेड़ दिया गया होगा देश
बिना नमक कच्चा गोश्त चबाने का मौसम होगा
अंतिम समय अनंत समय के लिए टाल दिया गया होगा
तुम्हारे निचले होठ के मांस में दर्द भीषण बढ़ रहा होगा
टेसू फूले होंगे

एक विराट हांडी है
खुदबुद खुदबुद करती श्वेत-लाल पट्टों पर टंगी हुई
चमचम सितारों भरी नीली सपनीली
कठिन करेजे को चीर रही गीली सी भाप धुन
सुन सुन सुन चुन चुन चुन
एकोहं एकोहं एकोहं
नाश हो तृतीय का

पूंजी की नाल ठुंके राष्ट्र राज्य के घोड़े
खींच रहे चैरियेटसांवल रंग हत्यारा विश्वजयी
हमारी शिराओं के रस्ते पर बढ़ा चला आया है मन तक
उससे अछूता नहीं भीतर का रन तक
घन तक और बन तक जन तक दर्पण तक
दर्पण के पीछे का मोरपंख कहाँ गया?

एक अष्टपाद है अस्थिहीन,
हाथहाथ सिर्फ हाथसूचना का जाल और माथ
पृथ्वी भर बिंधे हुए लाखों करोड दृगएक-एक मीन-मृग
खारे समुन्दर का राजा वह चषकों में रक्त ढाल उन्मत्त
लहरों की बाहें मरोड़ तोड़ देता है
मकर-उरग-झखगन सब
एक-इक इशारे पर जमींदोज किये गए
लाखों बरस के प्रवाल द्वीपजमी सभ्यताएं और प्रायद्वीप

किताबें खत्म हो चुकी होंगीं
बर्क और कोहे-तूर दोनों इंतज़ार में मुरझा गए होंगें
नीम के पेड़ों से लटकती आत्माओं की याद स्मृति से धुली जा चुकी होगी
मरी हुई बोलिया सुरक्षित ताबूतों में सहेजी ली गयी होंगीं
जंगल के सीने से बहता खून रुक नहीं पा रहा होगा
लहराते गेसू थाम शाम को
अपनी जाँघों पर पटक चुका होगा सूरज
तुम्हारा माथा दर्द से फट रहा होगा

एकध्रुवी एकरूपता के वितान तले
बहुमंजिल बहुदेशी खौफनाक मॉलों की तह-अजीब
गर्म-तप्त शीशा उंडेल रहा कानों में
नरक में घूमती फटी हुई मुखमुद्रा वाली छोकरियाँ
देह और दिमाग की फटन को संभालती सुलाती
गाती हैं लोरियाँ

एक बूढा आदमी है
हस्बे-मामूल जिसकी पीठ पर लदे हैं पहाड़
कमर तिहरी बोझ से चिटखा किये हैं हाड़
हाथी का पैर कभी हाथी की पूंछ
कभी जंगल देखता है कभी पेड़
मेड़उद्दालक की तरह
बना गिनी पिग

मियाँ गुमसुम गरीबदास की दाढी खुंसी हुई पृथ्वी के कान में
वली के मकान में नींव में गड़ी आँखेंनहीं नैन
गजाला के नैनों में चैन कहाँ बैन कहाँ होठों पर
आत्मा के हर एक पिक्सल पर संगीन छायाएं शोभ रहीं

सब कुछ जा चुका होगा
संस्कृतियाँ कमा चुकी होंगीं
लोकतंत्र की भूरी-खाकी फसल पक चुकी होगी
हत्यारा आ चुका होगा
लिबरटी के माथे के काँटों से बिंध-बिंध ओजोन परत
छलनी हो चुकी होगी छंटनी हो चुकी होगी आर्यावर्त में
टैंक आ चुके होंगे और तुम रेचेल !
पूंजी के बुलडोजर तले पिघल
अंधेरी घाटियों के गोल टीलों तक बिखर चुकी होगी
है न !