04/09/2012

देह की लीला


देह की लीला के भीतर
बहुत गाढ़ा चटख नीला रंग


अंगुलियां डूबती जाएँ
कलेजा सींझता जाए


सलेटी रंग धूसर याद के
अनमन पखेरू छू रहे हैं
दर्द दुनियावी

आतंक निरतर झर रहा


मन भर रहा और सिहरता


हर वक्त के अपराध
हावी हो रहे हैं


खुदी की हरी गहरी
फट रही काई


जल से झांकता है
कौन मनु ?


लम्पट, प्रगल्भी पुरुष, ब्राह्मण
वही जिसकी आत्मा में दफन हैं स्त्री-दलित सब

आँखें सियाही की

टपकती कंदराएं

उजाला सोखने वाली


हर सौंदर्य को
घटतोल कर हैं माल करती

मुझी से अलग मुझ में

रक्त के थक्के जमाती बात मेरी


उचक्के ख्यालों की जीभ खुरदुर
चाट लेती रक्त के जर्रे

जिसे हमने साथ रोपा था
मिट्टी-घास से भरपूर लतपथ
कीच-कादो में

उसी ललछौहें अमोले को सुखाकर
बना ली डंठल नुकीली


यों परिवार चलते रहे
यों हथियार चलते रहे


मैंने अंत की कविता
थोड़ा रो चुका भी


तुम्हारी,
कल

सुनी जाए ?