देह की लीला
देह की लीला के भीतर
बहुत गाढ़ा चटख नीला रंग
देह की लीला के भीतर
बहुत गाढ़ा चटख नीला रंग
अंगुलियां डूबती जाएँ
कलेजा सींझता जाए
कलेजा सींझता जाए
सलेटी रंग धूसर याद के
अनमन पखेरू छू रहे हैं
दर्द दुनियावी
अनमन पखेरू छू रहे हैं
दर्द दुनियावी
आतंक निरतर झर रहा
मन भर रहा और सिहरता
हर वक्त के अपराध
हावी हो रहे हैं
हावी हो रहे हैं
खुदी की हरी गहरी
फट रही काई
फट रही काई
जल से झांकता है
कौन मनु ?
कौन मनु ?
लम्पट, प्रगल्भी पुरुष, ब्राह्मण
वही जिसकी आत्मा में दफन हैं स्त्री-दलित सब
वही जिसकी आत्मा में दफन हैं स्त्री-दलित सब
आँखें सियाही की
टपकती कंदराएं
उजाला सोखने वाली
हर सौंदर्य को
घटतोल कर हैं माल करती
घटतोल कर हैं माल करती
मुझी से अलग मुझ में
रक्त के थक्के जमाती बात मेरी
उचक्के ख्यालों की जीभ खुरदुर
चाट लेती रक्त के जर्रे
चाट लेती रक्त के जर्रे
जिसे हमने साथ रोपा था
मिट्टी-घास से भरपूर लतपथ
कीच-कादो में
मिट्टी-घास से भरपूर लतपथ
कीच-कादो में
उसी ललछौहें अमोले को सुखाकर
बना ली डंठल नुकीली
बना ली डंठल नुकीली
यों परिवार चलते रहे
यों हथियार चलते रहे
यों हथियार चलते रहे
मैंने अंत की कविता
थोड़ा रो चुका भी
थोड़ा रो चुका भी
तुम्हारी,
कल
कल
सुनी जाए ?