बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर...
कैसा रहे
अगर पूरा घर एक रंग में रंग दिया जाय तो
नीला या केसरिया, लाल या काला
ताले का रंग भी वही हो जो चेहरे का हो
कितना मजा आएगा सोचकर देखिए
दुनिया डेयरी मिल्क की हो जाए तो
गंदी, चिपचिपी और बेइन्तहा मीठी उस दुनिया में
चाकलेटी कमीनापन कौंध जाए तो
रो कर बताइए, हंसिए या फ्रैंड ऑफ़ फोन लीजिए
कीजिए कुछ कीजिए
पापी पेट का नहीं
पूरे सौ करोड़ के अपडेट का सवाल है।
श्रीमान प्रश्नसूची के उत्तराधिकारी
अधिकारी बंधु चौंक पड़े
राजा शिवि की तरह कबूतर की तौल बराबर मांस काटते हुए
माध्यमिक शाला से बगूले की तरह आए
रामसहाय लूले के जवाब से-
ऐन आइडिया कैन चेंज युअर लाईफ
सर जी, बिसर गए सरकशी, घूरने लगे
एक बड़े से ‘व्हाट’ ने जकड़ लिया उनको
थूक के थक्कों की दरारों से
गूंजी आकाशवाणी-
‘घोर कलिकाल में यही है घन बिजुरि सी
झमकि झमकि घटा पश्चिम से छाई है,
पूरब प्रताप पुण्यभूमि पितृभूमि पिण्ड
पापिन के अंत की वसंत रितु आई है’
ठीक तभी कंध्माल में पंचायतों के सिरहाने
दरख़्तों ने जमुहाई लेनी शुरू की
कैंडी, जैम, पप्पी और पों के सुरों में जाने-जानां के लिए.
उनके हाथों में बर्फीले दस्ताने थे
पैरों की चपलता से मात खाती थी बिजली
बेरोज़गार जिस्म में फफोले थे
बारोज़गार आंखे श्रद्धा के आवेग में सफेद हो चलीं थीं
आदिम आग से नए रिश्ते के गुलाम
वे तीन मुंह वाले देवताओं, पार्टियों और हथियारों की गिरफ्त में थे
उन्मादी, क्रूर और भयावह भाषणों के बीच फंसे वे
गुजरात में सीडियों में बम रखने के लिए तैयार किए जा रहे थे
उनके शरीरों से खींची जा रही थी आत्मा की हर बूंद
वे उड़ीसा में झोपड़ियां जलाने के लिए जारी किए गए थे
बारी थी उनके अंत की, चेतना के अंत की
अंत की सभ्यताओं की, इतिहास के अंत की
बिना किसी ट्रेनिंग के
कम्प्यूटर से कुंडली बांचते-बांचते उसने सीखा
फंड ट्रांसफर करना, हैक करना अकाउंट, वायरस बनाना
उसका यह ज्ञान काम आया देश के
जब एनकाउंटर में मारे गए उसी जैसे दूसरे नौजवान के खाते में पुलिस को
दिखाने थे कई करोड़
तो तोड़-मरोड़ तथ्यों की होती ही रहती है
यहां सच हुई वही बात
जो एक किसान ने अपने सबसे छोटे बेटे से कही थी
मरते वक्त,
करीं बेगारी, त हाथ ना बिगारीं
सुपारी जब ले ही ली है इस देश की प्रजातांत्रिक सरकार ने
तब गरम सपनों और ठंडे भविष्य के बीच
असलियत की रेत सरक ही जानी थी
हाथ भी बिगड़ ही जाना था
और यह सब होना था
ठां-ठां करके
सारी दुनिया से इश्क बयां करने के एकमात्र बचे तरीके से.
सब केमिकल लोचा है
छह बाई छह की बोसीदा कोठरी में कपड़े बदलते हुए उसने कहा
सोते-सोते हजारों साल की नींद के बाद उसने जब आंखें खोलीं
उसे भूख लग आई थी
वह फिर सोना चाहता था
सूबे के मुख्यमंत्री का नाम उसे कबका भूल चुका था
विष्णु के चक्र की परिधि पर घूमते
इन्द्र के वज्र की तरह सूखे-कड़े-पपड़ियाए
सपनों की रस्सी पर लटक कर
सीधे वह बिल गेट्स के दरबान के सामने गिरा
देश के मिलेनियम स्टार और युवा गांधी
वहां भी उससे पहले हाजिर थे
झुकने की सीमाओं के परे
झुके हुए
आई आई टी कैम्पस से पढ़ाई पूरी करते न करते
आत्महत्याओं वाले सुहाने दिन आ गए थे
पैकेजों वाली कम्पनियां अभी तक नहीं आईं थीं
कम तनख्वाह की हताशा में
हाथ पकड़ लिया
डूबती कम्पनी के इक्सक्यूटिव मैनेजर ने छुटके का,
‘रूडीज’ देखते वक्त,
आपके बच्चे क्या सीख रहे हैं
रामायण सिखाने की जिद ठाने बैठा है पूरा परिवार
छंटनी से लाचार
कारोबार है अपना अपना
ऐड एजेंसी का मालिक कहता है खरी-खरी
भली-बुरी के खाके से बाहर आइए हुजूर
किसी भी भाषा में बेची जा सकती है ख़जूर
मेरे देश में
पैसा सिर्फ पैसा ही नहीं है
वह सांपों की भाषा है
डालर की तरह लहराते आते हैं शब्द
हरे विष की धुंध में लिपटे
लोक से, शास्त्र से, गुरु से, वेद से,
टी वी से, मोबाइल से,
टकसाल के दुर्ग से, हथियारों से लैस होकर
हमले के लिए तैयार.
कोसी की बाढ़ में फचीट दी गई लाखों जिंदगियों पर
गायों के थनों में लहराते
भाषा के समुंदर के उपर
महुआ चैनल से गूंजती है लोकभाषा
नौजवानों के जंगल में बिला जाती है,
नाहीं चाही हमका और, हमका हऊ चाही
पेटेंट कराईए जल्दी मनोज बाबू
बिकने वाला माल है, बवाल है
मोना डार्लिंग ने शरमाकर
सोने का पता बता दिया मनोज बाबू को
और सर पर पांव रखकर भागीं
नोएडा से नए किसी नोएडा की ओर
हिपहापर से प्यार की गुजारिश करती हुईं
क्योंकि वहां वे उसके घर में बराबर बरतन-शरतन मांजती थीं
यह सो कर उठने का वक्त था
आधी रात की संतानों ने ख़ब्त में
सारा गुस्सा ज़ब्त करते हुए
टी वी पर कार्यक्रम देना शुरू किया
विकास विकास विकास
मंत्रों की तरह दुहराने से भी खत्म होते हैं शब्द
आदिम ध्वनि भी शेष नहीं रह गई इस शब्द में
अर्थ के अंत की आख्यायिकाओं की नवेली सूझ को
बूझ पड़े प्रधानमंत्री नवेले आई टी सभागार में
बोले बधाई हो, कमाई हो, दुहाई हो,
जैसे हमारे दिन बहुरे, सबके बहुर जाएं
सारी दुनिया सभ्य बने, सर्वे सन्तु निरामया
तब राजनैतिक दलालों की शेरो-शायरी के बीच
ब्रह्मंड के उस पार से उतर आईं कम्पनियां
अश्वमेध् के घोड़ों की तरह
पुनीत आहुतियों, काउंटर गारंटी और सस्ते मजूरों की तलाश में
इस तरह नए भारत की नई खोज के पहले कदम में
देश की धडकन खोजी गई
नब्ज़ पहचान ली गई
गुजरात और उड़ीसा की सेजों पर
मेजों पर, प्रयोगशाला की लिटा दिया गया
यही तो है देश की धड़कन धक् धक्
कैसा होगा जब अपनी ही देह
अपने दिमाग पर काबू पा ले
किसी दूसरे के बहकावे में
हंसते-हंसते अचानक चुप हो गई बालिका वधू
विज्ञापन आने लगे थे बीच हंसी में
कहानी के बाहर के संदेश कहानी के बीच
खड़े हो गए
रिलायंस का नेटवर्क
जल-जंगल-जमीन-आसमान-हवा-आग और
सपनों तक में एक पल भी छोड़ने को तैयार न था
निजीपने के एकांत सामाजिक दायरों में रगेद दिए गए थे
पहले एक दुनिया बनाई गई
फिर एक मुट्ठी
फिर बंद किया गया मुट्ठी में दुनिया को
मुनिया छटपटा रही थी गरम गीली लिसलिसी कैद में
दम घुटने से आंखों में लाल रस्सियां उभर आईं थीं
आंखें सुफैद थीं
और ह्वाइट फेस देखकर दिल डांस मार रहे थे
चारो तरफ।
जगत के पांचों पदार्थ और छप्पन व्यंजन
प्रिय नहीं थे उसके
रीढ़ की हड्डी के छोटे-छोटे टुकड़े
कड़-कड़ की आवाज के साथ उसके दांतों में जायका पैदा करते थे
मसूड़े खुश हो जाते थे
आत्मा में तैरती थी आनंद की गंध मज्जा से मिलकर
इंसानी रीढ़ का यह स्वाद
जितना फैले उतना अच्छा है,
सच्चा है, होने से दिखना
टिकना कच्चा है.
जीवन के साथ और बाद में भी टिकी थीं कम्पनियां
पांच सौ गीगाबाइट के स्मृति क्षेत्र में
आंकडे़ थे अंचल भर की मनुष्यता के.
राम और रैम का एक साथ इस्तेमाल करते हुए
प्रगति के पथ पर उतारू हो गये सूबे
खून और मांस की चिपचिपी सतह को
डर के बुरादे से सुखाया गया
चिपकाया गया डालर हर डग पर
एस एम एस से जनता पैदा की गई
और नैन नैनो के लिए बिछा दिए गए
छौने तैयार थे जिबह के लिए
नई सुबह के लिए
स्लमडाग करोड़पति देखते-देखते
अचानक बिब्बू ने एक ईंट उठाई
और झटके से पूछा-
यह किसकी गाड़ी है,
फफूंद लगी अर्जियों और बोसीदा डिग्रियों
के दमघोंटू धुंए में सने हुए
नाज़िर ने सिर उठाकर बताया
जताया सवाल बेपफालतू है
पालतू हैं जवाब.
तब
प्रबंधन के उस्ताद मात कर रहे थे अखिल भुवन को
गति से, उत्तेजना से और रेस से,
जिस्म और आत्मा का हर हिस्सा इसी रेस में शामिल था
रेस सांसों की, रेस धड़कन की.
यह दिल मांगता तो है मोर,
पर चोर कहकर गिरफ्रतार किया गया
पाईरेसी करने वाले नौजवान को जब,
नाड़ी भांपने में कुशल अपराध्-निर्माताओं के फ़िल्मी
आले छटपटाने लगे
सीने में घुसने के लिए.
ताले जकड़ गये थोबड़ों पर
भौंडे ढ़ंग से सवाल उठाया पलटकर जब
अनवारूल आज़मी ने
नब्बे में जनमे ग्लोबल टीन-एजिए हिंदुस्तानी मुसलमान की
कहानी के बारे में.
रवानी में पानी पड़ गया
जीभ में गड़ गया लुकमा,
कौन लेगा जिम्मेदारी,
डिसइन्वेस्टमेंट मिनिस्टरी क्या करेगी फिर?
सिर उतार लेगी
पब्लिक का, सेक्टर का
हुण मौजा ही मौजा है इस जमाने में
नदारद है मौज
फौज है चारो तरफ
हत्यारों के जुलूस रात के अँधेरे से
निकल सरेआम बाजार में
प्रचार कर रहे हैं
विचार की छाँव में
तब भी लोगों ने बाजार के किनारे
गांव बसाने की शुरूआत कर दी है
रात की गहरी कालिख से लीपे जा रहे हैं रास्ते
लीपे जा रहे हैं खलिहान
और इसी रात में अपना घर है
हालांकि खुसरो की बातों में संशय है
खुसरो की आंखों में डर है।
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