याद की राहगुज़र
धीरे-धीरे, फिर तेज
न जाने कब से बारिश हो रही है
जहां मैं हूं
सूझता नहीं है साफ रास्ता
कहीं किसी ओर
यह सावन की रात है
काली, गहरी और कीचड़ से भरी हुई,
इतिहास में ऐसी रातों का कोई ख़ास जिक्र नहीं
नेहरू की डिस्कवरी से भी बाहर रही यह
और बिनोवा के संत हृदय नवनीत का कीचड़
तो इससे बिल्कुल जुदा ही था
फाइव स्टार झोपड़ियों,
जिनमें आजकल राजकुमार रात बिताते हैं
बताते हैं, यह रात वहां भी नहीं है
अगस्त के महीने में जमी
घुप्प अंधेरी रातों की चर्चा
बाबा किया करते थे, ठेठ देशी ठाट में
कि ऐसी रातों में दिशा-मैदान के लिए भी
दो फुट जमीन नहीं मिलती
गन्धते रहते हैं रास्ते
कीचड़-कादो से
वे पूरे नब्बे साल जिए
पफगुआ ध्रते हुए रुंधे गले से
दमा की बीमारी की गोद में सर रखे
दादी के गुजरने के बाद
रह गए चटकल बंगाल के किस्से-कारनामे
जिनमें हांड़ी सिर और बित्ते बराबर कान वाले
सरदार पटेल आते थे
जादू करते थे जिंदा और मुर्दा सबपर,
हल्ला मचाते लोग चुप हो जाते थे.
पर सावन की बेशऊर चिपचिपी कीचड़ का जिक्र
उनके बयान के पीछे हिलकोरता था
ताकता था उचककर
हालांकि वे इस किस्से को
पूरी सफाई से कहने की कोशिश करते थे
पैरों की उंगलियों में
बदबूदार कीचड़ से बने घाव को
गरम तेल से सींचते पिता
ख़ासे परेशान रहते थे
खेतों से धन रातोंरात गायब हो जाते, बह जाते
कीचड़ व अगस्त के राज में
मनमाने तौर से टूट जाती मेंड़
आधी रात में, भिनसारे
पिता फावड़े के साथ
खड़े होते थे ठीक फावड़े की तरह
गहरा मारना है फावड़ा
कीचड़ और सावन और अगस्त और अन्धेरा,
फावड़ा गहरा मारना है
धान के लिए हमें यह सब करना पड़ेगा.
चौहत्तर से अब तलक
उनके साथ खेत नहीं जा पायी बहन
ले भी नहीं गए कभी
उसके लिए सावन की बदबूदार रातें
झूले की तरह थीं
हालांकि कई बार
सरककर वह झूले के पटरे से नीचे
गोबर और कीचड़ में गर्क होती रही
मां अपनी ठठरी समेटे
दलान से कीचड़ बाहर ढकेलती
जतन करती
अगस्त, सावन और कीचड़ के खिलाफ
उसकी जंग का दस्तावेज कहीं नहीं लिखा गया
इतिहास में तो बिल्कुल नहीं
पिता बार-बार सुनाते
जवानी में घर छोड़ने का किस्सा
फिर लौटना
बहुगुणा की सरकार में सरकारी मास्टरी
जेल जाने के किस्से
'आधी रोटी खायेंगे, सेन्ट्रल जेल को जायेंगे'
तो सावन था, अगस्त था और
अन्धेरा बदस्तूर था
पर चोर दरवाजे कहां नहीं होते
सबसे कातर आवाज में मां गाती
'गज और ग्राह लड़त जल भीतर
नाथ हो गज के पिंड छुड़ावा'
मां खड़ी है उसी समय से
अगस्त और सावन और अँधेरे और कीचड़ के बीच
अब लगभग छोड़ चुके हैं खेत जाना पिता
अधिया पर हैं कुल बारह बीघे
जो मालिक नहीं हैं
दक्खिन से आते हैं
उनके घर वैसे ही है
पश्चिम के खि़लाफ
डंकल के बीज
डाई, यूरिया, पोटास की कीमत
और रोज-रोज का अपमान
पूंजी है
जिससे एक छटांक तिलहन भी नहीं खरीदा जा सकता।
हम तब से डरते हैं
अगस्त और सावन और अँधेरे से
सांप, बिच्छू और कीड़ों से
मस्ज़िद टूटने पर मां उदास थी
पिता निर्लिप्त ढंग से खुश थे
हम अगस्त के सूखे कुंए में सांप खोज रहे थे
दिसंबर तक चली हमारी खोज
रोज-रोज
मुझे पुलिस की वर्दी
और कीचड़ सने सांप
एक जैसे लगते हैं तभी से
जिस घर में छिपा करते थे हम
बारिश, कीचड़, रात और अँधेरे से बचने के लिए
मुंडेरों पर सांप रहने लगे हैं वहां
निगरानी रखते हैं हरकतों पर
बरकतों पर ऐसी नजर टांकते हैं कि
हरा पेड़ पलभर में ठूंठ हो जाए
उस वक्त भी
मां कीचड़ से बचाने के लिए
गाढ़े लाल आलते में
डुबो देती थी हमारे पैर
और हम बेखटके
रौंदते हुए बढ़ लेते थे कीचड़ में.
इतिहास की किसी किताब में नहीं है तो क्या
बचने का रास्ता मान के बिना नहीं मिलेगा
यह हम बहुत पहले से जानते हैं.
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