04/08/2011

मांदगी के वक्फे में

ये फूल-फूल ही हैं न
या फिर बबूल हैं
वक्त के दर-आशना...
मैं जब तुम्हारे न पास होता
तो याद करना भी क्या बला थी 
जो अब तो कुछ भी बची नहीं है

मेरे रकीब मुझे मार
हाथ बांध, साथ -साथ
घाट-बाट
घात साध
बात जान
तेरे तो आन-बान
शान
है निशान
काटो जी काटो जी,
मारो जी बान

हलचल झटपट मत कर
ठहर, लहर दर लहर
पहर दो पहर
कहर है शहर
पक्का बेबहर

जा छोड़ दिया तुझे मैंने अपने भीतर से
हंसना है तो हंसों
डसो मत फंसों

किसके हैं खत
मत पढ़
आगे बढ़

मैं जब पास होता नहीं तुम्हारे
वारे-न्यारे होते हैं
संभाल कर रखे हैं मैंने ख़्याल
डैने तुम्हारे कतरे हुए जैसे

जुए के नीचे कौन पिस रहा है
डोभाल ने बताया
समझाया
आ आप आपदा
संपदा क्या है मैं
रघुवीर सहाय से पहले समझ गया

तुम जब होते हो तो होते हो
ढोते हो मुझे
मरे हुए बच्चे को ढोती बंदरिया देखी है कभी
रमी खेली है कभी

सभी खेलते हैं कुछ न कुछ
लाल पान की बेगम  ट्वेंटी नैन का खेल
झेलते भी हैं हम
गम पी कर सो जाओ राजा जानी
फानी दुनिया में काहे को खोजे है कोई भी वृत्त-अंत
कविता से काहे की कर रहे शिकायत

दुःख बूझने वाले को बुलाओ
पटना से ही बुलवाओ वैद्य
पर कौन बूझेगा उस दुःख को
जो सहार से निकलकर
बिहार में बदलने की छटपटाहट लिए हुए है
आहट लिए हुए है उस वक्त की
जब मैं तुम्हारे साथ होते हुए भी अपने साथ नहीं था

गा रे रे गा सा
माप धन-ई
मनी मत चांप
कांप
क्योंकि
आशा के सामने निराशा का खूबसूरत
पुरसूकून घर है
सर है जानेमन का।

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