मेरे भीतर एक डोमाजी उस्ताद बैठे हैं
(वीरेन डंगवाल के संग एकालाप)
http://kabaadkhaana.blogspot.in/2010/11/blog-post_30.html
क.
"'क्या करूँ
कि रात न हो
टी.वी. का बटन दबाता जाऊँ
देखूं खून-खराबे या नाच-गाने के रंगीन दृश्य
कि रोऊँ धीमे-धीमे खामोश
जैसे दिन में रोता हूँ
कि सोता रहूँ
जैसे दिन-दिन भर सोता हूँ
कि झगडूं अपने आप से
अपना कान किसी तरह काट लूँ
अपने दांत से
कि टेलीफोन बजाऊँ
मगर आयं-बायं-शायं कोई बात न हो"
तब मेरा क्या होगा वीरेन दा-
दिन कहीं बचा है क्या वीरेन दा?
कि पूरा दिन एक विशाल चमकीली काली पट्टियों वाला विज्ञापन है
जिसमें रंगों क़ी अंधेरी सुबहें परवाज़ करती हैं
कि पूरी रात एक रिमोट है
जिसके बटन दिन के हाथों में हैं.
कि पूरी कायनात एक स्क्रीन में बदल गयी है
सब कुछ आभाषी हो गया है.
कि प्रेम करने को आतुर कमीने नंगे बदन खुले रास्ते में खड़े हैं
रास्ता छेंक कर
कि रक्त की शरण्य भी आखेटकों की सैरगाह है
कि पटक देने का जी चाहता है सर
कहीं भी
कहीं कुछ भी नष्ट नहीं होता
अविनाशी हो गया है सब कुछ
कोई ऐसी जगह बची ही नहीं जहां कोई न हो
दुनिया के सारे दर और दीवार, जिन्हें घर कहते है
ख़ाक हो गए हैं
आइये एक पहाड़ उलटकर अपनी रीढ़ पर रख लें
और दब जाएँ इस अविनाशी नश्वरता के नीचे
दम घुटने से
मैं तो... मन करता है अपनी टाँगे धीरे धीरे रेत दूं, काट लूं
गर्दन खींच दूं रबर की तरह
मुट्ठियों में भींच लूं सारी हड्डियाँ
बाकी लोथ पटक दूं
सारे कमरे में फ़ैल जाये आदिम रक्त गंध
कहीं तो कुछ हो
मत बदले, बचा रहे
मत बचे, याद रहे
याद न रहे, सपने रहें
सपने जो हरदम हकीकत के अदृश्य हाथों की अवश कठपुतलियाँ हैं
और हकीकत तो वही है न वीरेन दा!
ये हम कहाँ आ गए वीरेन दा-
कि आपके गर्म हाथों में छुपाकर अपना मुंह
रोने का मन कर रहा है
पर आंसू नश्तर की तरह चुभ रहे हैं
रोती हुई आंखे दर्द से सूख गयी हैं
दिमाग की नस तक फ़ैल गया है चिपचिपा मांस
मेरी अपनी ही पलकें चुभ रही हैं खुले घाव में
आपकी हथेली को भेद हज़ार कीड़े भिनक रहे हैं
रक्त गंध के हर ज़र्रे में उनकी नुकीली सूंड गड़ गयी है
उसी भयानक स्क्रीन पर लाईव चल रहा है यह दृश्य
पीछे से एक V आकार में अंगुलियाँ उठाये एक हिंस्र पशु नगाड़ों के शोर में अपनी बारीक दाढ़ी में नफीस तराना पढ़ रहा है!
आप सुन रहे हैं न !
देखा आपने,
आपने देखा !
देख रहे हैं न.
चलिए उठिए वीरेन दा,
आप इतने घायल तो कभी नहीं हुए
हलक तक तक पसरे लहू में छप छप करते हम स्क्रीन पर दिख रहे हैं
देखिये नाटक नहीं है ये
टी वी चल रहा है
भागिए वीरेन दा
जल्दी करिए
कुचल नहीं सकते तो रेंग कर छुपने की कोशिश करिए प्लीज
हज़ार मेगा पिक्सल की रेंज में हैं हम !
लोग हंस रहे हैं
पापकार्न के ठोंगे और नया सिम, अभी अभी खरीदे गए हैं.
एक नौकरी चहिये वीरेन दा, मैं तंग आ गया हूँ इस हरामपंथी से
चुपचाप पडा रहूँ कोई आये न जाए कुछ सुनूं नहीं कुछ भी देख न सकूं महसूस करना बंद कर दूं बउरा जाऊं
सुख में नहीं दुःख में नहीं चेतना से भाग जाऊं
एक नौकरी चहिये वीरेन दा
अपने कमीनेपन क़ी बाड़ लगाकर रोक लेना चाहता हूँ सब
क्यों वीरेन दा
इस हरमजदगी के बाद भी वह मुझे प्रेम करती है
आप भी तो करते हैं
बर्दाश्त नहीं होता अब कुछ भी असली
मुझे छोड़ दीजिये
मत छूइए मुझे
हट जाईये
हटिये
मुझे एक नौकरी चहिये वीरेन दा
वहीं उस स्क्रीन के भीतर
मेरे गले तक उल्टिओं का स्वाद भर आया है
उसे पी लूंगा
मैं कमज़ोर नहीं हूँ वीरेन दा
आपने क्या समझ रक्खा है
मैं जानता हूँ ये सब नकली है
मैं अभी फोड़ डालूँगा पूरा प्रोजेक्टर
एक नौकरी दिलाईये न वीरेन दा
नहीं दिलवा सकते फिर भी दिलवाईये तो.....
शाम को मर जाता है वक्त
वक्त क़ी लाश पर दिन और रात के गिद्ध खरोंचते है जटिल आकृतियाँ
सुबह गीला लाल रंग पसर जायेगा सब ओर
24 -7 का धंधा है यह
इतनी कठपुतलियाँ इतने वेग से इतनी तरफ घूम रही हैं
इतने धागों से बंधी हुई बड़े से देग में
यह रणनीति बनाने का वक्त है
वहीं चलिए वीरेन दा
उठिए, लहू सने होठों में खैनी दबाइए
अपनी कैरिअर वाली साईकिल निकालिए
चलिए चलते हैं कानपूर के रास्ते
जहां आपके दोस्त और मेरे गुरु हैं
लाल इमली की भुतही मिल की सीढियां उतरिये
जहां लोग हैं
इस स्क्रीन से बाहर निकालिए भाई
कोई प्यारा व्यारा नहीं है यहाँ
चलिए!
अपने सलवटों भरे चहरे को संभालिये
जी कड़ा करिए
हैन्डिल थाम लीजिये कस कर
बाप रे! संभालिये
इतनी तेजी इस उम्र में
मैं छूट जाउंगा
गिर जाऊंगा मैं
सहस्रों फुट नीचे यहीं खो जाउंगा मैं
इन प्रिज्मों की आभाषी दुनिया में
ज़रा धीरे चलिए
हज़ारहां रपट चले घुटनों पर तो तरस खाईये
ये कोई फैसले का वक्त नहीं है
अभी तो रात बाकी है बात बाकी है
बाकी, मीर अब नहीं हैं
कोई पीर भी नहीं है
हिंस्र पशुओं से भरा ये अन्धेरा काफी डरावना है
अपने डर से डरिये वीरेन दा धीरे चलिए
मेरे भीतर एक डोमाजी उस्ताद बैठे हैं
मुझसे डर बुड्ढे
धीरे चल
चाल बदल कर नहीं बच सकता तू !
माफ़ करिएगा वीरेन दा
अनाप-शनाप बक गया गुस्से में
पर जा कहाँ रहे हैं
चला तो आप ऐसे रहे हैं जैसे जल्दी ही कहीं पहुँचना है हमें
पर इसी स्क्रीन के भीतर कहाँ तक जायेंगे आप
ऐसा न करिए कि मुझे गिरा दीजिये कहीं
यह रास्ता इतिहास की तरफ तो जाता नहीं है
भविष्य की तरफ तो जाता नहीं है
वर्तमान में तो आप भाग ही रहे हैं
फिर जा कहाँ रहे हैं हम
अद्भुत है यह तो अविश्वसनीय असंभव
हम कहीं पहुँच गए
ये क्या जगह है दोस्तों
ये क्या हो रहा है
मुझे मितली आ रही है
फिर से दिन उग आया है वीरेन दा
चिड़ियों की चोंचे नर्म शबनमी रक्त में लिथड़ी हैं
पेड़ अट्टहास कर रहे हैं
बाजरे की कलगी के रोयें चुभ रहे हैं भालों की तरह हवा की अंतड़ियों में
हरियाली के थक्कों के बीच आप मुझे कहाँ ले आये हैं
सरपट की नुकीली पत्तियां खुखरियों की तरह काट रही हैं मुझे
इतनी रेत इतनी रेत
मेरा दम घुट रहा है
वक्त बीत रहा है वीर....ए ..
ख.
एक दर्द है जो अब होता ही नहीं
एक मन है जो चलता ही नहीं
एक जिस्म भी है जिस पर मेरा छोड़ हर किसी का नियंत्रण है
एक दुःख है जो अब देश काल के शर से बिंधकर दुःख ही नही रह गया है
आजकल तो इतने मुल्कों से इतनी लाशें उठती रहती हैं इतनी चीजों की कि
दुनिया एक कब्रगाह जैसी हो गयी है
यहाँ आपसे धीमे धीमे बतियाते हुए भी मुझे डर है कि
हम एक बड़ी कब्र में तो नहीं बैठे हैं वीरेन दा?
नहीं...
अब पहले जैसी हालत नहीं है.
पक्का !
अब थोड़ा बेहतर महसूस कर रहा हूँ.
कितना परेशान किया आपको
मैं भी कैसा अभागा हूँ कि यह भी नहीं कर सका कि
कम से कम आपके जख्मों पर पट्टी ही बदल पाऊं
ऐसे हालात में आप न होते तो
मेरा क्या होता वीरेन दा?
चुप रहने से क्या होगा ?
कहा न मेरी तबियत ठीक है !
बेहतर हूँ भाई,
अब सुनिए-
की-बोर्डों की ठक-ठक के नीचे
विराट कम्पूटर के पीछे से
वहां, उस स्क्रीन के धागों में मैं जब झाँक रहा था
मैंने धब्बे देखे थे
लाल खून से भरे और चमकते हुए...
आप जानते हैं कुछ तो बताइये
उस विशाल स्क्रीन को
शार्ट सर्किट करने का कोई तो रास्ता होगा न
ओ हो, ये बात,
अरे वीरेन दा, मुझे न बनाइये
मैं तब से जानता हूँ आपको जब आप
कंधे पर लटकाए घूमते थे मुझे
मेरी बेसिक रीडर को संभालते बचाते
और तीनरंगे झंडे को उदास हसरत से देखते हुए
ग.
यहाँ कुछ हरा-हरा सा दिख रहा है
क्या यही वह जगह है जहां से
पलटकर
कुछ छीन लाते, मार खाते, मार देते लोग
आत्महत्या क़ी घिरी चौपाल में
ह्त्या के मंसूबे बनाकर.
'मरना' कहने से अपने घावों की
याद ताज़ा हो जाती है
और मारने से अपनी चोट भूल जाती है
हमारे अपने ही हैं ये दोस्त
सपने की व्यथा जैसे
कथा जैसी कई युग से कही जाती सुनी जाती आ रही है
गहरे पर्वतों के गर्भ में से
जंगलों की काष्ठव्यापी हरी कच्ची गंध से
पतली चपल और वेगवंती आ-वेग धारा से
बुलावा आ रहा है
चलेंगे वीरेन दा?
घ.
नील लोहित श्याम तन के
भृकुटियाँ टेढ़ी किये
अपने घरौंदों से चींटियों के झुंड निकल पड़े हैं.
कठोर अनुशासन में निबद्ध तालों पर धरते पैर
भांजते हाथ
माँगते साथ
गा रहे हैं
खौफ का सेहरा -
" हमारे दिल में नश्तर एक गहरा
लगा है अहर्निश पहरा
पूरे मुल्क की हर राह पर
बिछा है जाल गहरा
शिकारी आ रहा है
और लुभा रहा है
क़ि हम सब खा रहे हैं
क़ि मुखबिर गा रहे हैं
दिखाई नहीं देती आत्मा वह सात
पर्दों बीच नीचे सात सागर के
जंगल बीच जीवाश्मित बनाई जा चुकी है
अब खुदाई कर रहे है धनी मानी कुबेरों के लाडले
सांवली उस आत्मा के खनिज का
सौदा यह बनिज का
चलो उस नियमगिरि की कन्दरा में
चलो उस नद महा के पाट से पूछें
क़ि कब आया था हत्यादेश पहला
क़ि कब दाखिल हुआ था गर्भ पर
वह वज्र पहला
क़ि कब आत्मा अभागी चांदनी की रक्त छाया में व्रणाहत छिपी
औ कब गहरा हुआ वह जख्म
ऐसा कब हुआ ???
हमारी संगिनी के नाल से कब काट दी जाती रहीं
जीवन प्रवाही द्रव्य की लहरिल लताएँ
क़ि कब बदला गया भूगोल देहों का
क़ि कब नक़्शे सनातनता के उर के बीच
बीचोबीच गाड़े गए
कब पैदा हुई थी रक्तबीजी धजा वाले
साहबों की फ़ौज भूरी
व आस्था, खौफ में डूबी हुई एक बध्य, आकुल चीज
अब नरमेध होगा, जुटेंगे पार-देशिक पुरोहित, राजे-महाराजे
ऋचाएं क्षिप्र और संक्षिप्त होंगी
खैर, तो सवाल हैं जवाब हैं
जवाब हैं औ ख़्वाब हैं
औ ख़्वाब सब तबाह हैं
तबाह हैं क़ि हम ही हैं
क़ि हम जो हैं लड़ाके हैं
लड़ाके सब धमाके हैं "
डीयर मिस्टर वीरेन डंगवाल
व्हेअर आर यू, यू नो?
खबरची का संवाददाता है वह वीरेन दा
स्साले को पटक दूं उठा कर यहीं शीशम की गांठदार लकड़ी पर
हमेशा रोकते क्यों हैं आप ऐसे मौकों पर ?
वैसे मौकों पर भी रोकते हैं आप
जीने नहीं देंगें क्या ?
आखिर चाहते क्या हैं आप ?
खुद तो कुछ कर नहीं पाए और
मुझे भी यही कर छोड़ेंगे आप...
'रोता हूं धोता हूं रोते-रोते धोता हूं
तुम्हारे कपड़ों से खून के निशान धोता हूं
मेरे प्रिय साथियों
सुदूर कोने से खोज कर लाया हूं थोड़ी सी रेह माटी
ध्यान रखना,
ढेर खून साफ बहा तो साफ़ न हो पायेगा
दुश्मन और दोस्त के लहू मिलने नहीं चाहिए
राइफलें नहीं साफ होंगी तब
जबकि न तो हाथ साफ़ हों न तो दिल साफ हों
सिर्फ मेज साफ़ हो और पेज साफ़ हो और सेज साफ़ हो,
गेज़ साफ़ न हो'
ऐसा मैंने सुना, अपने भीतर वीरेन डंगवाल को कहते
ओफ्फोह इसीलिये इतना प्रेम है इस बेवजह मुत्फन्नी बुड्ढे से मुझे
परकाया प्रवेश की कला में महारत
मुझे भी सिखा दो सर
मैं भी तो देखूं क़ि
कौन रंग कौन बखत कौन दिशा कौन देश
कहाँ कहाँ जाता है
मेरे पास काहे नहीं आता है!
(वीरेन डंगवाल के संग एकालाप)
http://kabaadkhaana.blogspot.in/2010/11/blog-post_30.html
क.
"'क्या करूँ
कि रात न हो
टी.वी. का बटन दबाता जाऊँ
देखूं खून-खराबे या नाच-गाने के रंगीन दृश्य
कि रोऊँ धीमे-धीमे खामोश
जैसे दिन में रोता हूँ
कि सोता रहूँ
जैसे दिन-दिन भर सोता हूँ
कि झगडूं अपने आप से
अपना कान किसी तरह काट लूँ
अपने दांत से
कि टेलीफोन बजाऊँ
मगर आयं-बायं-शायं कोई बात न हो"
तब मेरा क्या होगा वीरेन दा-
दिन कहीं बचा है क्या वीरेन दा?
कि पूरा दिन एक विशाल चमकीली काली पट्टियों वाला विज्ञापन है
जिसमें रंगों क़ी अंधेरी सुबहें परवाज़ करती हैं
कि पूरी रात एक रिमोट है
जिसके बटन दिन के हाथों में हैं.
कि पूरी कायनात एक स्क्रीन में बदल गयी है
सब कुछ आभाषी हो गया है.
कि प्रेम करने को आतुर कमीने नंगे बदन खुले रास्ते में खड़े हैं
रास्ता छेंक कर
कि रक्त की शरण्य भी आखेटकों की सैरगाह है
कि पटक देने का जी चाहता है सर
कहीं भी
कहीं कुछ भी नष्ट नहीं होता
अविनाशी हो गया है सब कुछ
कोई ऐसी जगह बची ही नहीं जहां कोई न हो
दुनिया के सारे दर और दीवार, जिन्हें घर कहते है
ख़ाक हो गए हैं
आइये एक पहाड़ उलटकर अपनी रीढ़ पर रख लें
और दब जाएँ इस अविनाशी नश्वरता के नीचे
दम घुटने से
मैं तो... मन करता है अपनी टाँगे धीरे धीरे रेत दूं, काट लूं
गर्दन खींच दूं रबर की तरह
मुट्ठियों में भींच लूं सारी हड्डियाँ
बाकी लोथ पटक दूं
सारे कमरे में फ़ैल जाये आदिम रक्त गंध
कहीं तो कुछ हो
मत बदले, बचा रहे
मत बचे, याद रहे
याद न रहे, सपने रहें
सपने जो हरदम हकीकत के अदृश्य हाथों की अवश कठपुतलियाँ हैं
और हकीकत तो वही है न वीरेन दा!
ये हम कहाँ आ गए वीरेन दा-
कि आपके गर्म हाथों में छुपाकर अपना मुंह
रोने का मन कर रहा है
पर आंसू नश्तर की तरह चुभ रहे हैं
रोती हुई आंखे दर्द से सूख गयी हैं
दिमाग की नस तक फ़ैल गया है चिपचिपा मांस
मेरी अपनी ही पलकें चुभ रही हैं खुले घाव में
आपकी हथेली को भेद हज़ार कीड़े भिनक रहे हैं
रक्त गंध के हर ज़र्रे में उनकी नुकीली सूंड गड़ गयी है
उसी भयानक स्क्रीन पर लाईव चल रहा है यह दृश्य
पीछे से एक V आकार में अंगुलियाँ उठाये एक हिंस्र पशु नगाड़ों के शोर में अपनी बारीक दाढ़ी में नफीस तराना पढ़ रहा है!
आप सुन रहे हैं न !
देखा आपने,
आपने देखा !
देख रहे हैं न.
चलिए उठिए वीरेन दा,
आप इतने घायल तो कभी नहीं हुए
हलक तक तक पसरे लहू में छप छप करते हम स्क्रीन पर दिख रहे हैं
देखिये नाटक नहीं है ये
टी वी चल रहा है
भागिए वीरेन दा
जल्दी करिए
कुचल नहीं सकते तो रेंग कर छुपने की कोशिश करिए प्लीज
हज़ार मेगा पिक्सल की रेंज में हैं हम !
लोग हंस रहे हैं
पापकार्न के ठोंगे और नया सिम, अभी अभी खरीदे गए हैं.
एक नौकरी चहिये वीरेन दा, मैं तंग आ गया हूँ इस हरामपंथी से
चुपचाप पडा रहूँ कोई आये न जाए कुछ सुनूं नहीं कुछ भी देख न सकूं महसूस करना बंद कर दूं बउरा जाऊं
सुख में नहीं दुःख में नहीं चेतना से भाग जाऊं
एक नौकरी चहिये वीरेन दा
अपने कमीनेपन क़ी बाड़ लगाकर रोक लेना चाहता हूँ सब
क्यों वीरेन दा
इस हरमजदगी के बाद भी वह मुझे प्रेम करती है
आप भी तो करते हैं
बर्दाश्त नहीं होता अब कुछ भी असली
मुझे छोड़ दीजिये
मत छूइए मुझे
हट जाईये
हटिये
मुझे एक नौकरी चहिये वीरेन दा
वहीं उस स्क्रीन के भीतर
मेरे गले तक उल्टिओं का स्वाद भर आया है
उसे पी लूंगा
मैं कमज़ोर नहीं हूँ वीरेन दा
आपने क्या समझ रक्खा है
मैं जानता हूँ ये सब नकली है
मैं अभी फोड़ डालूँगा पूरा प्रोजेक्टर
एक नौकरी दिलाईये न वीरेन दा
नहीं दिलवा सकते फिर भी दिलवाईये तो.....
शाम को मर जाता है वक्त
वक्त क़ी लाश पर दिन और रात के गिद्ध खरोंचते है जटिल आकृतियाँ
सुबह गीला लाल रंग पसर जायेगा सब ओर
24 -7 का धंधा है यह
इतनी कठपुतलियाँ इतने वेग से इतनी तरफ घूम रही हैं
इतने धागों से बंधी हुई बड़े से देग में
यह रणनीति बनाने का वक्त है
वहीं चलिए वीरेन दा
उठिए, लहू सने होठों में खैनी दबाइए
अपनी कैरिअर वाली साईकिल निकालिए
चलिए चलते हैं कानपूर के रास्ते
जहां आपके दोस्त और मेरे गुरु हैं
लाल इमली की भुतही मिल की सीढियां उतरिये
जहां लोग हैं
इस स्क्रीन से बाहर निकालिए भाई
कोई प्यारा व्यारा नहीं है यहाँ
चलिए!
अपने सलवटों भरे चहरे को संभालिये
जी कड़ा करिए
हैन्डिल थाम लीजिये कस कर
बाप रे! संभालिये
इतनी तेजी इस उम्र में
मैं छूट जाउंगा
गिर जाऊंगा मैं
सहस्रों फुट नीचे यहीं खो जाउंगा मैं
इन प्रिज्मों की आभाषी दुनिया में
ज़रा धीरे चलिए
हज़ारहां रपट चले घुटनों पर तो तरस खाईये
ये कोई फैसले का वक्त नहीं है
अभी तो रात बाकी है बात बाकी है
बाकी, मीर अब नहीं हैं
कोई पीर भी नहीं है
हिंस्र पशुओं से भरा ये अन्धेरा काफी डरावना है
अपने डर से डरिये वीरेन दा धीरे चलिए
मेरे भीतर एक डोमाजी उस्ताद बैठे हैं
मुझसे डर बुड्ढे
धीरे चल
चाल बदल कर नहीं बच सकता तू !
माफ़ करिएगा वीरेन दा
अनाप-शनाप बक गया गुस्से में
पर जा कहाँ रहे हैं
चला तो आप ऐसे रहे हैं जैसे जल्दी ही कहीं पहुँचना है हमें
पर इसी स्क्रीन के भीतर कहाँ तक जायेंगे आप
ऐसा न करिए कि मुझे गिरा दीजिये कहीं
यह रास्ता इतिहास की तरफ तो जाता नहीं है
भविष्य की तरफ तो जाता नहीं है
वर्तमान में तो आप भाग ही रहे हैं
फिर जा कहाँ रहे हैं हम
अद्भुत है यह तो अविश्वसनीय असंभव
हम कहीं पहुँच गए
ये क्या जगह है दोस्तों
ये क्या हो रहा है
मुझे मितली आ रही है
फिर से दिन उग आया है वीरेन दा
चिड़ियों की चोंचे नर्म शबनमी रक्त में लिथड़ी हैं
पेड़ अट्टहास कर रहे हैं
बाजरे की कलगी के रोयें चुभ रहे हैं भालों की तरह हवा की अंतड़ियों में
हरियाली के थक्कों के बीच आप मुझे कहाँ ले आये हैं
सरपट की नुकीली पत्तियां खुखरियों की तरह काट रही हैं मुझे
इतनी रेत इतनी रेत
मेरा दम घुट रहा है
वक्त बीत रहा है वीर....ए ..
ख.
एक दर्द है जो अब होता ही नहीं
एक मन है जो चलता ही नहीं
एक जिस्म भी है जिस पर मेरा छोड़ हर किसी का नियंत्रण है
एक दुःख है जो अब देश काल के शर से बिंधकर दुःख ही नही रह गया है
आजकल तो इतने मुल्कों से इतनी लाशें उठती रहती हैं इतनी चीजों की कि
दुनिया एक कब्रगाह जैसी हो गयी है
यहाँ आपसे धीमे धीमे बतियाते हुए भी मुझे डर है कि
हम एक बड़ी कब्र में तो नहीं बैठे हैं वीरेन दा?
नहीं...
अब पहले जैसी हालत नहीं है.
पक्का !
अब थोड़ा बेहतर महसूस कर रहा हूँ.
कितना परेशान किया आपको
मैं भी कैसा अभागा हूँ कि यह भी नहीं कर सका कि
कम से कम आपके जख्मों पर पट्टी ही बदल पाऊं
ऐसे हालात में आप न होते तो
मेरा क्या होता वीरेन दा?
चुप रहने से क्या होगा ?
कहा न मेरी तबियत ठीक है !
बेहतर हूँ भाई,
अब सुनिए-
की-बोर्डों की ठक-ठक के नीचे
विराट कम्पूटर के पीछे से
वहां, उस स्क्रीन के धागों में मैं जब झाँक रहा था
मैंने धब्बे देखे थे
लाल खून से भरे और चमकते हुए...
आप जानते हैं कुछ तो बताइये
उस विशाल स्क्रीन को
शार्ट सर्किट करने का कोई तो रास्ता होगा न
ओ हो, ये बात,
अरे वीरेन दा, मुझे न बनाइये
मैं तब से जानता हूँ आपको जब आप
कंधे पर लटकाए घूमते थे मुझे
मेरी बेसिक रीडर को संभालते बचाते
और तीनरंगे झंडे को उदास हसरत से देखते हुए
ग.
यहाँ कुछ हरा-हरा सा दिख रहा है
क्या यही वह जगह है जहां से
पलटकर
कुछ छीन लाते, मार खाते, मार देते लोग
आत्महत्या क़ी घिरी चौपाल में
ह्त्या के मंसूबे बनाकर.
'मरना' कहने से अपने घावों की
याद ताज़ा हो जाती है
और मारने से अपनी चोट भूल जाती है
हमारे अपने ही हैं ये दोस्त
सपने की व्यथा जैसे
कथा जैसी कई युग से कही जाती सुनी जाती आ रही है
गहरे पर्वतों के गर्भ में से
जंगलों की काष्ठव्यापी हरी कच्ची गंध से
पतली चपल और वेगवंती आ-वेग धारा से
बुलावा आ रहा है
चलेंगे वीरेन दा?
घ.
नील लोहित श्याम तन के
भृकुटियाँ टेढ़ी किये
अपने घरौंदों से चींटियों के झुंड निकल पड़े हैं.
कठोर अनुशासन में निबद्ध तालों पर धरते पैर
भांजते हाथ
माँगते साथ
गा रहे हैं
खौफ का सेहरा -
" हमारे दिल में नश्तर एक गहरा
लगा है अहर्निश पहरा
पूरे मुल्क की हर राह पर
बिछा है जाल गहरा
शिकारी आ रहा है
और लुभा रहा है
क़ि हम सब खा रहे हैं
क़ि मुखबिर गा रहे हैं
दिखाई नहीं देती आत्मा वह सात
पर्दों बीच नीचे सात सागर के
जंगल बीच जीवाश्मित बनाई जा चुकी है
अब खुदाई कर रहे है धनी मानी कुबेरों के लाडले
सांवली उस आत्मा के खनिज का
सौदा यह बनिज का
चलो उस नियमगिरि की कन्दरा में
चलो उस नद महा के पाट से पूछें
क़ि कब आया था हत्यादेश पहला
क़ि कब दाखिल हुआ था गर्भ पर
वह वज्र पहला
क़ि कब आत्मा अभागी चांदनी की रक्त छाया में व्रणाहत छिपी
औ कब गहरा हुआ वह जख्म
ऐसा कब हुआ ???
हमारी संगिनी के नाल से कब काट दी जाती रहीं
जीवन प्रवाही द्रव्य की लहरिल लताएँ
क़ि कब बदला गया भूगोल देहों का
क़ि कब नक़्शे सनातनता के उर के बीच
बीचोबीच गाड़े गए
कब पैदा हुई थी रक्तबीजी धजा वाले
साहबों की फ़ौज भूरी
व आस्था, खौफ में डूबी हुई एक बध्य, आकुल चीज
अब नरमेध होगा, जुटेंगे पार-देशिक पुरोहित, राजे-महाराजे
ऋचाएं क्षिप्र और संक्षिप्त होंगी
खैर, तो सवाल हैं जवाब हैं
जवाब हैं औ ख़्वाब हैं
औ ख़्वाब सब तबाह हैं
तबाह हैं क़ि हम ही हैं
क़ि हम जो हैं लड़ाके हैं
लड़ाके सब धमाके हैं "
डीयर मिस्टर वीरेन डंगवाल
व्हेअर आर यू, यू नो?
खबरची का संवाददाता है वह वीरेन दा
स्साले को पटक दूं उठा कर यहीं शीशम की गांठदार लकड़ी पर
हमेशा रोकते क्यों हैं आप ऐसे मौकों पर ?
वैसे मौकों पर भी रोकते हैं आप
जीने नहीं देंगें क्या ?
आखिर चाहते क्या हैं आप ?
खुद तो कुछ कर नहीं पाए और
मुझे भी यही कर छोड़ेंगे आप...
'रोता हूं धोता हूं रोते-रोते धोता हूं
तुम्हारे कपड़ों से खून के निशान धोता हूं
मेरे प्रिय साथियों
सुदूर कोने से खोज कर लाया हूं थोड़ी सी रेह माटी
ध्यान रखना,
ढेर खून साफ बहा तो साफ़ न हो पायेगा
दुश्मन और दोस्त के लहू मिलने नहीं चाहिए
राइफलें नहीं साफ होंगी तब
जबकि न तो हाथ साफ़ हों न तो दिल साफ हों
सिर्फ मेज साफ़ हो और पेज साफ़ हो और सेज साफ़ हो,
गेज़ साफ़ न हो'
ऐसा मैंने सुना, अपने भीतर वीरेन डंगवाल को कहते
ओफ्फोह इसीलिये इतना प्रेम है इस बेवजह मुत्फन्नी बुड्ढे से मुझे
परकाया प्रवेश की कला में महारत
मुझे भी सिखा दो सर
मैं भी तो देखूं क़ि
कौन रंग कौन बखत कौन दिशा कौन देश
कहाँ कहाँ जाता है
मेरे पास काहे नहीं आता है!
(अपूर्ण)
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