30/10/2011

हलफ - २

'मैं तुमसे प्यार करता हूँ'  
निरछल इस वाक्य के नीचे
कई-कई सौ हज़ार गायब तहखाने हैं
बेपनाह ताकत और बेशुमार आदत
अरबों हत्यानुभाव
सदियों की कुंठा और अपनी कमजोरियां

घूरती लम्पट आँखें सुन्दर को
लम्पट को पाटते हैं सुन्दर विचार
सुन्दर विचारों के पीछे छछूंदर है
मन-भुजंग के हलक में अटका
उगलते-निगलते नहीं बना

झिटका सा लगता है हर बार
नंगे होते जाते हैं ख्याल
न मानने की जिद के कुंड में डूब जाता है विवेक
संशय की खाल ओढ़ निर्भीक घूमता है भेड़िया
मन के गलियारों में तन के अंधियारों में

बर्बरता के सीने में तर्क रोपते
बिछाते हुए समन और गुलाब  
हत्या के पहले मरती हो खुद ही
रोज-रोज बिस्तर पर
यही-यही हत्यारा प्रेम
छुपा हुआ एक वाक्य के नीचे

कितनी सुविधाएँ हैं
सब मेरे पास 
समय का ठीहा और खड्ग आधुनिकता की,
तर्क की प्रत्यंचा
साम दाम दंड भेद चार भाग सेना के
छल का अमोघ परशु बल है
चुप्पी का अस्त्र, शस्त्र भाषा का
लोकहित का अद्भुत और बेमिसाल कवच
चासनी में पगी हुई कठिन कृपाण जीभ
आठ आठ हाथ, तन्तुजालों से लैस
और सीना है भूरी नुकीली चट्टान
और है आत्मस्वीकार. बहुप्रयुक्त शरणगाह
कविता का बंजर... रुदन का अमोघ अस्त्र

निर्मम बधिक सा चलाता हूँ चमकीला
सुन्दर सफ़ेद दोधारा तुम्हारे अस्तित्व पर
बेहद प्राचीन किसी भाषा में पढता हूँ मन्त्र
बलि की यही है निर्धारित प्रक्रिया

प्रेम के हज़ार अर्थ
दमन का यह एक ही
भाषा की सीमा से परे
किसी काव्यभाषा के बस में नहीं यह सब
कह पाना

कवि मित्रों !
अवसरानुकूल कोई भाषा है आपके पास ?


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