12/07/2012


हे दिल्ली!

भीषण है यह रात
कटेगी कैसे?

पाले की परछाईं ओढ़े
बदहवास सी भाग रही थी शाम
सुईयों के कंधों पर लादे वक्त
घड़ी भी हांफ रही है
ठिठुरी जाती
मन में जमी बर्फ की सिल्ली

दिल्ली ऐसा कर देती है
डर देती है...

आठों याम हकबकायी सी  
ऊँचे-ऊँचे सेतु-संभाले, उच्चावच हरकारे
ऊँचे ख़्वाब, तनिक दाब से फट जाते
खरबूजा माफिक
इंसानों के भीतर उगते
महा-फ़्लैट के सौ-सौ माले

मधु-विष के बिल्लौरी प्याले
भर देती है
जर देती है
गूंगा-बहरा कर देती है...

हृदयहीन चौबारा दिल्ली
सत्ता का जयकारा दिल्ली
मधु कैटभ सी रक्तबीज सी
खिन-खिन नव अवतारा दिल्ली

प्रेम बेचती जगमग जगमग
चमकाती है चेहरा
वह भारी कवि शायर आलिम
जो सबसे बे-बहरा
कुंठा कीच दाग अच्छे हैं
हत्या का जयकारा दिल्ली 

दिल्ली दिल्ली दिल्ली दिल्ली 
मुक्तिबोध की कविता की जासूसी बिल्ली